बहुत समझाया उसे पर मन उसका चंचल है नहीं समझ उसे अभी जा रहा वो गलत राह है बस में नही वो खुद के किसी की सुनता भी नही है इसी चिंता से आज दु:खी हुआ बेचारा मेरा मन है।
ना जाने क्या हो गया बादल का रुख बदल गया बारिश आंखों से हो गई चांद प्रेम का ओझल हो गया। उगता सूरज कही खो गया किरणों का दम घुट गया अँधियारो में नयन बैरन हुई मेरा दिल टूट बिखर गया।
नींद से दोस्ती टूट गई तारों से नाता जुड़ गया रात अंधेरों में गुम हो गई सुनसान सड़क आजाद हो गई, बतियाँ सारी दफन हो गई पत्र प्रेम का खूनी हो गया खुशियां कोसो दूर चली गई कहानी ही प्यार की कफ़न हो गई।
पल पल बढ़ती दूरियां राह अनजान लगने लगी जब साथ उसका छूटा दुनिया सुनसान लगने लगी बेसहारा बना दिल मेरा आवारा मैं भटकने लगी नाम से कोसो दूर बदनामी के गले लगी जो कुछ था मेरा सब लुटा बैठ रोने लगी लेने वाला यूँ हंस आगे चला मैं बस उसे देख खुद को कोसने लगी। स्वरचित
चाहत वो है जो हजारों बार होती है , और नई चाहत की उम्मीद लगाए आगे बढ़ती जाती है और पिछला भुला दी जाती है सच्ची चाहत वो नही जो भूला दी जाए ये तो वो है जिसे एक दुल्हन सी सजा हमेशा अपने मन रूपी मंडप में बैठा जीवन का एक हिस्सा बना ज़िन्दगी निर्वाह की जाती है परवाह नही कि जो तुम्हारी सच्ची चाहत हो वो तुम्हे भी उतना ही चाहे जितना कि तुम पर हाँ तुम्हारी उसके प्रति वफादारी एकाग्रता की तरंग जरूर उसे तुम्हारी तरफ खिंच लाएगी ।
जमाना बित गया तुमसे मिले, और तुम कहते हो कल ही तो मिले थे, ना चाहो मिलना तो कोई अंकुश नही, पर हाँ इस कदर रोज रोज के, ना मिलने के बहाने बनाना तुम्हे शोभा नही देता, क्या तुम भूल गए वो दिन जब मुझसे मिलने के लिए छोटे बड़े सारे बहाने बनाते थे, और मैं बिना मना किये बिना कुछ पूछे, कुछ ना कहते हुए , तुम्हारे पास एक पल में दौड़ी चली आती थी, उस पल को तकती मेरी आँखें अब पथरा सी गई है और तुम लगातार कहे जा रहे हो कल ही तो मिले थे कल ही तो मिले थे। स्वरचित
सुनाती हूँ मै, तूम्हे एक कहानी, एक दिन हुई थी, मैं प्रेम दीवानी, कहने को तेरे, मैं बनी थी रानी, पर तूने मुझे, सदा समझा बेगानी, सुन.. चाहत की लड़ी, अब मुझे, कही और ना लगानी, सिर्फ तेरी हूँ, तेरी ही बनकर, ज़िन्दगी बितानी । स्वरचित
प्यार के नौका पर होके सवार करती रिश्तों के सागर को पार सांझ ढ़लते ही याद आता है यार मिले मनमीत मुझे बस उसका इंतजार ये चाहत मेरी और दिल की है पुकार तुम आओ पास मेरे सरकार। स्वरचित सीमा मूथा "जोशी" जोधपुर राजस्थान
तुम जा रहे हो क्यो मुझसे बिना मिले ही नही चाहते ना मेरी शक्ल देखना क्या गलती हुई मुझसे बस यही ना दिल मे जगह तुम्हारे अलावा किसी को नही दी बरसो बरस से तुमको ही सिंहासन पर बैठाया रखा मत जाओ छोड़ मुझे एक बार फिर कह रही रुक जाओ ना यहां राज तुम्हारा है और तुम्हारा ही रहेगा एक बार तो मुझसे मिलने आओ ना आओ तो दूर से ही बस अपनी नज़रे मुझ पर डाल दो मैं जानती हूं और विश्वास भी है कि तुम रुक जाओगे मुझे अकेला छोड़ नही जाओगे।