ZINDAGI KI RAH


ए जिंदगी तू कितनी अजीब है

कहीं सरल तो कहीं कठिन है 

राह में तेरे बिखरे घनेरे कांटे हैं 

हो रहे पैरों में तेरे कितने छाले हैं

हर कदम तेरे इम्तिहान की घड़ी है 

सम्भल, ज़िन्दगी बेड़ो से तू जड़ी है

सुख और दुख दोनों की कड़ी है

देखना तुझे तू किस ओर खड़ी है

ना थम ना थक तुझे सीधे ही चलना है

क्योकि...

तलाश तुझे एक बड़ी मंजिल की है ।

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